Sunday, January 18, 2009

उत्तराखंडी बचपन...


उत्तराखंडी बचपन बड़े ही अजीब ढंग से ब्यतीत होता है, आज कल के आम शहरी बचपन की तरह नही, जो वीडियो गेम, कंप्यूटर और न जाने कई प्रकार के आधुनिक उपकरणों से खेल खेलते हैं। पहाड़ी बालक शायद इन बच्चों की तुलना में सर्वाधिक भाग्यशाली होता है, क्यूंकि वह अपने बचपन का भरपूर आनंद लेता है पहाड़ की हसीं वादियों में। वह अनभिज्ञ रहता है तमाम इलेक्ट्रॉनिक खिलोनो से, वह बना लेता है हर पहाड़ी वस्तु को अपना खिलौना, जब भी देखता है या आँखे खोलता है उसे दिखती है सम्पूर्ण प्रकृति एक खिलौने की तरह। तभी तो मस्त रहता है पहाड़ी बालक अपनी धुन में गीत गुनगुनाता है, जो पहाड़ की विरुदावली ही होती है। व्यस्त रहता है हिसोले, किन्गोड़, काफल, मेलु, और न जाने कई प्रकार के पहाड़ी कंद मूल खाने में, वह जाता है गाय को जंगल में चुगने और पूरे जंगल को मदमस्त कर देता है बांसुरी की मधुर धुन से, बांज के लिखवाल से बनता है सीटी और बजाता है उसे, और जब जाता है खेत में तो हल लगते समय निकलने वाले मिटटी के डलों को तोड़ता है या फ़िर मस्त रहता है एक घरौंदा बनाने में, वह या तो गाँव के पालतू कुत्तों के साथ खेलता है या फ़िर गाँव में साथ के बच्चों के साथ गुल्ली डंडा खेलता है। वह हर रोज़ अपने में महसूस करता है प्रकृति की सुन्दरता को, और रोज़ साक्षात्कार होता है उसका प्रकृति से मनो यह प्रकृति की रोम-रोम में बसने की प्रक्रिया हो गर्मियों में गाँव में स्थित आम के पदों में चडा हुआ या किसी पहाड़ी नदी या गधेरे में गोते लगते हुए मिलता है, या फ़िर किसी सीली (नमी वाली जगह जिसे गढ़वाली में सिमार भी बोलते हैं) जगह में हिसोले बीनता हुआ मिल जाएगा। सर्दियों में अंगीठी के सामने बैठकर किसी खुदेड़ (दुःख भरी धुन) या फ़िर "बेडू पाको बारामासा" की धुन को गुनगुनाता हुआ दिख सकता है। या फ़िर बर्फ से खेलता, बर्फ के गोले बनाकर उनको फेंकता हुआ दिख सकता है।




एक तरफ़ अगर प्रकृति ने कठोर मुसीबतों को दिया है तो दूसरी तरफ़ उन मुसीबतों को हल करने का उत्कृष्ट दिमाग भी दिया है, इस बात का उदाहरण है एक १०-१२ साल का बालक जंगल में गाय चुगने जाता है और खेल खेल में प्याज से "घराट" का एक मॉडल तैयार कर देता है, या फ़िर एक पेड़ को काटकर उसके बीच में छेड़ करके उसे एक पेड़ के बने खंभे में टांग देता है , और फ़िर दोनों और से दो बच्चे बैठकर आधुनिक पार्कों में घूमने जैसा आनंद लेते हैं।



यहाँ पर बालिकाओं का बचपन भी अद्बुद ही है, लड़कियां बचपन में खेल कूद के साथ साथ घरेलु कम-काज में हाथ बंटाना सीख जाती हैं। घास काट कर लाना तो आम बात है ही, कुछ बालिकाएं तो खाना तक बनने में भी मदद करती हैं।[click here...]
कुछ भी हो तमाम बैटन के बाद भी अगर सबसे अच्छा बचपन कहीं बीतता है तो ओ पहाड़ में है, भले ही वहां पर बच्चा साइकिल न चलाना सीखता हो पर वह अपने लिए साइकिल जरूर बना देता है (फोटो). भले ही वह शहरों में बने पार्कों में जोगिंग नही करता हो पर वह घने जंगलों में चीड और देवदार की छाया में जरूर सुस्ताता है। वह भले ही फ्रीज का ठंडा पानी, या कोल्ड ड्रिंक्स नही पीता हो पर वह प्राकृतिक स्रोतों का पानी जी भर-भरकर पीता है।

Tuesday, January 13, 2009

तेरी याद साथ है....!

Happy Lohri and Makkar sankranti..

उत्तराखंड में कहा जाता है की कोई भी जवान यहाँ अपना पसीना नही बहता, बल्कि पहाडों से दूर रहकर शहरों में वह पसीने को बोता है। चाहे इसे नियति कहें या भाग्य का खेल लिकिन ये सत्य है। वह मजबूर है अपने सुरम्य पहाडों को कई किलोमीटर पीछे छोड़कर शहरों में रहने के लिए। उन्ही शहरों में जहाँ जीवन बड़ा ही अजीब है। किसी को किसी की जरा भी परवाह नही है यहाँ पर, सब को अपनी जिंदगी के साथ चलते हुए देखा है, अनायास ही फ़िल्म हम दोनों की लाइन याद आती हैं - “मै ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुवें मे उडाता चला गया“। जाने कहाँ जाते रहते हैं सारे लोग रात मे, दिन मे, सुबह को, शाम को। बस भीड़ है इन शहरों मे, जाने इतने लोग कहाँ से आते हैं और कहाँ जाते हैं।
उत्तराखंड के एक छोटे गाँव से थोड़ा पड़ लिखकर एक जवान ने करियर बनाने की सोची दिल्ली मे आकर,
दिल्ली एक शहर हमारे देश की राजधानी, उसने देखा सड़कें भरी हैं, बस, ट्रक , ऑटो, की आवाजें , बड़ा ही अजीब लगा उसे , कुछदिन उसे पहाड़ की याद सताती रही मगर बाद मे घुल-मिल गया वह यहाँ के वातावरण मे, और उसकी भी ज़िन्दगी हो गई व्यस्त, नौकरी मिल गई, और ज़िन्दगी रह गई खाना, ऑफिस जन, घर आना, सो जाना

आज रात को १० बजे मा का फ़ोन आया गाँव से-
मा- बेटा कैसा है तू दिल्ली मे।
बेटा- ठीक हूँ मा, जल्दी ही घर आऊंगा।
मा- बेटा घास काटने का वक्त आ गया, कोई घास लगाने वाला नही है घर आ जा कुछ दिनों के लिए छुटी लेकर।
बेटा- मा कल बात करूँगा सुबह अभी ऑफिस के लिए देर हो रहा हूँ।
मा- बेटा कैसा ऑफिस है जहाँ रात मे काम होता है?
बेटा- मा ये दिल्ली है यहाँ दिन मे, रात मे , सुबह मे , शाम मे हर वक्त काम होता है, यह कोई स्कूल नही है की मास्टर साब नही गए तो हाजिरी लग जायेगी। ये प्राइवेट नौकरी है जहाँ न जाओ तो पैसा कटता है , और अगर जाओ भी तो फ़िर भी कट सकता है।
मा- बेटा रात को काम पर जाता है तो सोता कब है?
बेटा- मा दिन मे सोता हूँ, सारे दिन सोता हूँ, रात को ऑफिस जाता हूँ। अच्छा अभी जा रहा हूँ कल फ़ोन करूंगा ८ बजे शाम को।
मा- ठीक है बेटा अब तेरे लिए वहां जाकर ८ बजे रात शाम हो गई है।
यही है ज़िन्दगी यहाँ पर जो दिन रात का फर्क भी नही जानती है। यहाँ पर सारे लोग पैसा बनाना चाहते हैं, नोट छपने की मशीन बनना चाहते हैं, और बन भी जाते हैं।
…………………………………………………पर इस सब से अलग, तमाम भाग दौड़ की ज़िन्दगी के पश्चात् वह घर आता है ऑफिस से, उसे याद आती है उसी पहाड़ की जिसमे वह पला बड़ा हुआ है, हाथ पैर धुलने के लिए जाता है बाथ्र्रोम मे तो अनायास ही मा का गर्म पानी से भरा लोटा याद आ जाता है, जिस से ओ धुला करता था हाथ पावं अपने चौक के किनारे। उसे याद आती है उसके फौजी दोस्त की जो जवानी देश के नाम कर रहा है, कभी कश्मीर मे तो कभी लदाख की पहाडियों मे, बर्फीली हवा खा रहा है जो वहां पर। याद आती है उन पड़ी मा बहनों की जो बर्फ गिरे होने के बावजूद जाती हैं शाम को पालतू जानवरों के लिए घास लाने, ठण्ड के मौसम मे पड़े ह्यून (बर्फ) की, सफ़ेद हुए पहाडों की, बर्फ से लादे पेडों के सुस्ताने की, बर्फ गिरते रुई के फुहारों की, मदमस्त कर देने वाली उस बर्फीली हवा की, एक भीनी सी खुशबू जो बर्फ गिरते हुए उड़ती है वातावरण मे उसकी। खाना खता है तो याद आती है गहत के फाने की, लिंगुदा की भुज्जी की, अदरक और लहसुन के पत्तों से पिसे हुए नमक मे छांछ मिलकर पीने की, और न जाने क्या क्या तस्वीरें आती हैं दिमाग मे सो जाता है इसी याद मे और जब जगता है तो फ़िर वही ज़िन्दगी, वही दिन वही शुरुआत, सब कुछ बदल गया है ज़िन्दगी मे।
इसी याद मे बीच-बीच मे वह जाता रहा घर मे और फ़िर शाद्दी भी हो गई, बाल बचे हुए, वह बूडा हुआ, फ़िर अब उसका जवान बेटा आया है इसी दिल्ली मे, उसकी भी वही ज़िन्दगी है जो कभी उसकी । नियति का या फ़िर भाग्य का जाने किसका नियम मने इसे…………………….

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पहाड़ की दहाड़...

सुनसान रात आज कुछ ज्यादा ही खामोश थी, हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड राज्य जो तब उत्तर परदेश में था, नीद की सुनहरी गोद में पसरा हुआ था, वह अक्टूबर के महीने की बात है, ठण्ड का प्रकोप कुछ ज्यादा ही था। उत्तरकाशी जिल्ले के एक गाँव में लोग किसी भी समय आने वाली प्रलय से बेखबर सुनहरे सपनों के साथ सो रहे थे, रात आधी से भी ज्यादा समाप्त हो गई थी और सबको आने वाली नयी भोर का इंतज़ार था, लोगों के पालतू जानवर, जंगली पशु पक्षी सब बेखौफ सो कर भोर का इंतज़ार कर रहे थे, एकाएक खूंटे पर बंधे हुए जानवरों के गले की घंटियाँ बजने लगी जिसका मतलब था की जानवर खौफजदा हो गए थे, कुत्ते भोंकने लगे, और पक्षी चहचहाने लगे, जब तक कोई कुछ समझ पता, धरती के अन्दर हो रही उथल पुथल साफ़ कानो में आने लगी, स्वप्नों में खोये लोग उस उथल पुथल को सुनकर जाग गए और बहार आकर देखने को तत्पर हुए ही थे की………।धरती हिलने लगी!

छार दीवारों के अन्दर पसरे लोग कुछ समझ पाते की मकान भरभरा कर गिरने लगे, और लोग अन्दर ही कैद होने शुरू हो गए थे, केवल कुछ ही पलों में सब कुछ बदल रहा था, जानवर खूंटे पर रम्भा रहे थे, जानवरों की गौशाला, चिडियों के घोंसले, हर प्राणी का अस्तित्वा मिटने को तत्पर थी धरती, वही धरती जिसने अतुल्य, अनमोल प्यार दिया था इन धरतीवासियों को, वही धरती जिसकी गोद में ये लोग इस सृष्टि में आए थे, वही धरती जो इन लोगों की सभी इच्छाएं, आकंक्षाये पूर्ण कर रही थी, और करने का संकल्प लिया है इस धरा ने, जाने आज क्योँ क्रोधित हो गई थी, साक्षात् रणचंडी बन गई थी, मनो सारी सृष्टि का संहार करने को तत्पर हो। धरती हिलती गई ………कुछ देर बाद सारा वातावरण शांत हो गया, पूरी तरह से शांत शायद धारा मा कुछ नरम हो रही थी, सुबह होने में कुछ ही वक्त बाकी रहा था। चारों ओर का माहौल बदल गया था, जहाँ खुशियों के साथ दिन की शुरुआत सूर्य निकलने के बाद होती वहां बिलाप कर के सूर्य के निकलने का इंतज़ार हो रहा था। कई लोग खँडहर हुए घरों में दम तोड़ रहे थे कई लोगों का साथ उनकी साँसे छोड़ चुकी थीं, परदम तोड़ रहे लोगों की मदद करना भी मुश्किल था क्योँ की न कोई उजाला था, न कोई इस हिम्मत में था की किसी की मदद कर सके, हर घर में लाश दबी थी, हर घर में यदि
कोई रोने वाला बचा था तो रो रहा था वरना मदद मांगने के लिए कोई भी नही दिख रहा था।
आख़िर उस भयानक रात के बाद एक नई सुबह, जो दुखों का कहर भी साथ लेकर आई , उस गाँव का मंजर यह था की चरों तरफ़ करुणा, बिलाप, क्रंदन हो रहा था, मकान ध्वस्त हो गए थे, जानवरों ने खूंटे पर ही दबकर दम तोड़ दिया था, ओ मदद के लिए रम्भा भी न सके, इंसानों की लाशे जो दबी हुई थी निकली जाने लगी, किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी की बहन तो किसी की मा की कब्र उनके मन्दिर स्वरूप घर में बन गई थी, तो किसी का पूरा का पूरा परिवार ही उस कब्र में दफ़न हो गया था। जंगलों में पेड़ टूट कर बिखर गए थे, पक्षियों के घोंसले टूटकर नीचे बिखर चुके थे, कुछ पक्षी क्रंदन करते हुए चहचहा रहे थे, कौआ अपने घोसलों के बच्चों की मौत के कारण चिल्ला रहे थे। इंसान ही नही मनो पूरी प्रकृति विलाप कर रही थे, दहाड़े मार मार कर रो रही थी, ईश्वर को कोष रही थी।
और लोगों की मदद करने लगे, सूने पड़े शमशान घाटों में जन सेलाब दिख रहा था, पूरे इलाके में शमशान की घाटी में धुवें का गुबार दिख रहा था, कई कई लाशे एक साथ जल रही थी, पिचकी हुई लाशे, दबी हुई लाशे, कतरा-कतरा हुई लाशे। खुदाई का काम शुरू हुआ, लाशे निकाली जाने लगी
जो पहले दिन नही निकाली जा सकी, जानवरों की लाशें घसीट कर फेंकी जाने लगी और फ़िर अगली रात सबके लिए क़यामत की रात, कल तक जो साथ खा पीकर सोये थे आज उनके साथ नही थे, काल तक जिन्होंने बैठकर हुक्का पिया था आज साथ नही थे, कल तक जो साथ में रहकर घूमकर आए थे ओ आज जा चुके थे कभी न मिलने के लिए, जो फौजी साल में दो महीने की छूती लिए घर आया था वह फ़िर वापस न जा सका, जो लाडली अपने पीहर आई थी वह वापस न जा सकी।


ख़बर मिलते ही बचाव दल आए, एन जी ओ आए, सरकार ने मदद के लिए स्पेशल पैकेज की घोषणा की, ख़बर मिली की १००० के करीब लोग मरे गए, और कई घायल हो गए, कई हमेशा के लिए जीते जी मर गए कई अपंग हो कर रह गए। लोगों ने कहा ६.६ रेक्टर का भूकंप था।
यह एक रात का कहर था जो पहाड़ वासियों के दिलों पर कई जख्म लगा गया, कुछ ही वक्त के लिए आया और फ़िर चला गया। सबसे ज्यादा नुक्सान उत्तरकाशी जिल्ले में ही हुआ, सबसे ज्यादा मौतें वहीँ हुयी थी। लोगों को तम्बू मुहेया कराये गए क्योंकि घर बार टूट चुके थे, खाने को राशन दी गई, ओड़ने को कम्बल दिए गए, काफी जन मन और धन तीनो की हानि हुयी, साल बीतते रहे और दुनिया बदलती रही पर नासूर बन गए वे जखम जो उस रात ने दिल को दिए थे, कभी भी एक कसक एक टीस दिल में जगा देते हैं।


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मलेथा की गूल

“एक सिंह माधो सिंह, एक सिंह गाय का,
एक सिंह माधो सिंह, और सिंह काइ का। “

उत्तराखंड एक तरफ़ अपनी खूबसूरती के नाम से परसिद्ध है, तो दूसरी तरफ़ यहाँ के वीर पुरुषों से भी परसिद्ध है, यहाँ के इन्ही वीर पुरुषों में से एक वीर माधो सिंह भंडारी परसिद्ध हैं, श्रीनगर गढ़वाल से लगभग ४ किलोमीटर की दूरी पर तथा देवप्रयाग से लगभग ३० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मलेथा गाँव, अलकनंदा नदी के दहने तट पर बसा यह गाँव अपनी सुरम्यता, सौन्दर्यता से परिपूर्ण है। मलेथा गाँव अलकनंदा के तट पर होने के कारन मैदानी भाग की तरह लगता है क्यूंकि यहाँ पर समतल भूमि है।


इसी मलेथा गाँव में सोलहवीं- सत्रहवीं शताब्दी में कालो भंडारी के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ, नाम रखा गया माधो सिंह भंडारी, तमाम बच्चों की तरह माधो का बचपन भी खेलने में खेतों में घूमने में बीता, जवान हुआ तो उसने अलकनंदा नदी के तट पर बसे सूखे मलेथा को देखा, जो पानी के सामने होते हुए भी सूखा था, वहां पर पड़ी खेतों की तरह झंगोरा और कोदा की ही पैदावार होती थी। जवान होकर माधो सिंह सेना में भरती हो गया, मलेथा तब गढ़वाल के रजा की राजधानी से बिल्कुल नज्दीग था तो माधो सिंह ने श्रीनगर गढ़वाल में राज महल में सैनिक बन गया। कुछ लोग अपनी तकदीर को अपने हाथों से लिखते हैं और कुछ लोग अपने हाथों से अपने भाग्य को लिखते हैं यही माधो ने किया, वीर सूत माधो की वीरता से रजा ने खुश होकर उसे सेनापति (जनरल) बनाकर तिब्बत भेज दिया।


तिब्बत में माधो ने अपना परचम लहराया और, गढ़वाल राज्य को चारो और फैलाया। कई दिनों बाद माधों घर वापस आया, और अपनी पत्नी से खाना लेन को कहा, देखता है की उसकी पत्नी नही आई, गुस्से में आकर चिलाकर उसने पत्नी को आवाज़ दी तो वह भी गुस्से में बिलबिलाकर बोल पड़ी, की आपको चावल, सब्जी या फल क्या चाहिए।
भारतीय इतिहास में कई कहानियाँ आती हैं जब किसी ने पति को सही राह दिखाई और ओ कुछ एसा कर बेठे जो उनसे उम्मीद नही की जा सकती थी, यही माधो ने भी किया, मलेथा गाँव की दहनी तरफ़ चंद्रभागा धारा (गधेरा) बहता है, माधो ने उस धारा का पानी मलेथा के खेतों(अब स्यारों) में लेन की युक्ति सोची, एक पहाड़ बीच की रुकावट बन रहा था तो माधो ने लगभग ९० मीटर lambi व ५ फीट चौडी सुरंग बनाकर पानी की एक गूल बना दी जो लगभग ३ किलोमीटर है।
गूल का निर्माण पूरा होने के बाद पानी मलेथा के खेतों में खोला गया, पर पानी नही आया, तब कुछ लोगों ने कहा की यह गूल बलि मांग रही है, माधो का एकलौता जवान बेटा उसकी नजर में आया और उसने गूल के मुहाने पर उसकी बलि दे दी……आज से पांच सौ साल पहले शिक्षा एवं तकनीकी ज्ञान का अभाव था। ऐसे समय में माधोसिंह भंडारी ने अपनी उत्कृष्ट तकनीकी के साथ इस सुरंग का निर्माण कर इतिहास में त्याग, तपस्या और बलिदान की सच्ची मिसाल कायम की।……धन्य है वह मलेथा की धारा जहाँ माधो सिंह जैसे वीरों का जन्म हुआ और धन्य है वह मलेथा के खेत जिनमे आज सरसों के पीले फूलों से है बहार रहती है, जहाँ आज बासमती चावल उगता है।

Monday, January 5, 2009

हथकरघा एवं हस्तशिल्प उद्योग को बढावा मिलना चाहिए.


उत्तराखंड में हथकरघा व हस्तशिल्प उद्योग के लिए कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध मिलता है। अगर जरूरत है तो बस इस उद्योग के लिए एक मार्केट बनने की, पहले नेशनल लेबल का बाज़ार बना दिया जायऔर फ़िर इन उत्पादों को इंटरनेशनल लेबल पर बेचा जाय तो स्थानीय लोगों को रोज़गार के साथ साथ राज्य का रेवन्यू भी बढेगा।
वर्तमान में निजी छेत्र ही हथकरघा उत्पादों को एक्सपोर्ट करता है जो की केवल एक करोड़ रूपये का बाज़ार है, अब आवश्यकता है इस बाज़ार को विस्तृत करने की, राज्य सरकार को इस दिशा में सोचना होगा और आज के आधुनिक युग में जहाँ टेक्नोलॉजी का जमाना है, इस बाज़ार को उत्तराखंड में ही रहकर विश्वव्यापी बनाया जा सकता है। क्योँ की इन्टरनेट के इस ज़माने में सारी दुनिया आपस में जुड़ी हुई है ।


उत्तराखंड के जंगलों में बड़ी आसानी से कच्चा माल प्राप्त हो जाता है, अगर इस तरफ़ ध्यान दिया जाय तो उत्तराखंड से पलायन भी कुछ कम हो जाएगा, अगर उत्तराखंड सरकार सत्ता में आने से पहले पलायन कम करने का वायदा करती है तो उसे इस प्रकार की योजनाओं पर अमल करना होगा और बुनकरों के लिए भी नई योजनायें बनानी होंगी जिससे उन्हें मार्केट से पहले पूंजी मिल सके।
हाथ से बने ऊनी स्वेटर, मफलर, टोपी या दस्ताने या फ़िर कंबल, शॉल, स्टॉल, चादरें व अन्य घरेलू सामान आदि सामन उत्तराखंड में आसानी से बुनकर बना देते हैं , इसके साथ ही काशीपुर, मंगलौर व उधमसिंहनगर की मशहूर सूती, रेशमी व ऊनी चादरें, कंबल, दरियां, गलीचे, पर्दे, वॉल हैंगिंग व अन्य सजावटी सामान का उत्पादन बहुत ही कम मात्र में होता है, यहां ऊंचाई वाले स्थानों पर पाई जाने वाली ऑस्ट्रेलियन भेड़ की ऊन से भी कई उत्पाद बनाये जा सकते हैं जो की अभी बहुत ही कम मात्र में प्रयोग की जाती है।

Sunday, January 4, 2009

बांस का उत्पादन बड़ा सकता है पहाडियों की आमदनी

बांस का उत्पादन पहाड़ वासियों के तकदीर बदल सकता है,
वर्षों से पहाड़ की एक ही कहानी एक पंक्ति में कही जाती है की, "पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नही आती है", पर अब देखा जे तो पानी से विद्युत् उत्पादन पर सरकार ने जोर दिया ही है तो दूसरी तरफ़ खंडूरी सरकार पलायन रोकने की कोशिशों में भी कार्य कर रही है। इस दिशा में कार्य करने के लिए राष्ट्रीय बांस मिशन योजना के तहत उत्तराखंड सरकार अगरसर है, और साथ में है उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद, जो इस योजना पर कार्य कर रही है। एक तरफ़ अगर देखा जाए तो बांस से आर्थिक स्थिति तो मजबूत होगी ही, अपितु दूसरी तरफ़ बांस की रोपनी से पर्यावरण भी स्वच्छ रहेगा, या पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलेगी।
अब जरूरत है की सरकार इस तरफ ध्यान दे और काश्तकारों को तकनीकी ज्ञान भी मुहेया कराये जिस से एक काश्तकारों को कोई जोखिम न उठाना पड़े, और साथ ही सहकारी बैंकों से लोन भी मुहेया करवाए, जिसे से आरम्भ में पूँजी लगा सकें। इस योजना को कार्यरूप देने के लिए सरकार को अपने उद्यान सचल दल कर्मियों को पर्शिक्षण दे कर उनसे ही काश्तकारों कको मदद दे सकती है।
अब देखना यह है की सरकार इस मुद्दे पर केवल खयाली महल बना रही है या फ़िर केवल कागजी कार्रवाई कारेगी, ऐसा एक बार पहले भी हुआ था आज से पाँच साल पहले जब कोदा को भी यही बोला गया थापर किसी का भी ध्यान उस दिशा में आज तक नही गया।